में अब तुमसे बात नहीं करता!
तुम्हें पुकारता भी नहीं हूं!
में नहीं कहता कि तुम्हें जब वक्त मिले तो मुझसे राब्ता क्यों नहीं करती!
में नहीं कहता अभी रुक जाओ! अभी मत जाओ!
मुझे नींद नहीं आ रही तो तुम भी मत सो!
में तो अब तुम्हारे सामने भी नहीं आता! जाने कब से मेने तुम्हें पुकारा नहीं, तुम्हें सदाएं नहीं दी! जाने कब से तुम्हें एक नज़र देखा नहीं!
तुम्हारा नाम लिया!
वो जो तुम्हें बेबाक नामों से पुकारा करता था, वो अब ख़ामोश है! बिल्कुल ख़ामोश!
तुमसे लड़ता भी नहीं!
कोई शिकवा ना ही कोई शिकायत, कुछ भी तो नहीं करता!
में अब कहां कहता हूं....
तुम सिर्फ़ मेरी हो! सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी!
में अब कहां किसी से भी लड़ता हूं!
कहां किसी से भी छीनता हूं! कब किसी से कहता हूं कि तुमपे सिर्फ़ मेरा हक़ है!
सब कुछ छोड़ चुका हूं! यहां तक कि तुम्हें याद करना भी छोड़ दिया!
छोड़ दिया तुम्हें तुम्हारे हाल पर! छोड़ दिया तुमसे लड़ना झगड़ना!
हां मगर........
तुम आज भी मेरी दुआओं के दायरे में हो! अब भी आयत-उल-कुर्सी पढ़ कर तुम्हें दम करता हूं! अब भी कई कई घंटों तुम्हें सोचता हूं!
क्योंकि में आज भी तुमसे मोहब्बत करना नहीं छोड़ सका!
अब भी नहीं छोड़ सका तुम्हें चाहना, तुमसे मोहब्बत करना!
आज भी तुमसे मोहब्बत के मामले में शिद्दत पसंद हूं!
आज भी तुमसे मोहब्बत करने में वैसा ही जुनूनी हूं!
मगर अब ख़ामोश हूं!
बिल्कुल ख़ामोश....!😔😞
~वाहियात फिलोसॉफर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें