तुम्हारी आवाज़!
कई जानी-पहचानी आवाज़ों में से एक है
मेंने आवाज़ों को मेहसूस करना बहुत पहले सीख लिया था,
ये दिल वो दिमाग में रच-बस जाती हैं, किसी टेपरिकॉर्डर के जैसे
तुम्हारी आवाज़ भी दिल वो दिमाग में, एक कैसेट में फीड होकर रह गई हैं!
शायद! तुमको लगे ये बढ़ा चढ़ा कर बयान करना है,
लेकिन....
कुर्रा-ए-अर्ज़ (The globe of earth) पे कुछ अफ़राद (Members) ऐसे ज़रूर होंगे, जिनको तुम्हारी आवाज़ बीमारी मे शिफा बख़्श सके।
हो सकता है में भी उन चांद बीमारों में शामिल हूं....!🥀🖤
~वाहियात फिलोसॉफर
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