हम मिडिल क्लास लोगों पर मोहब्बत ना मिलने के असारात बहुत ज्यादा वेहशतनाक होते हैं,
हम नफरतों के ज़हान में बड़े होते हुए कब मोहब्बत कर बैठते हैं हमें ख़ुद नहीं पता चलता है!
हमें इस बात को अंदाज़ा तब होता है जब हम मोहब्बत का ज़वाल (Loss) देखते हैं।
मोहब्बत हमारे वजूद पर पहले-पहल तो ऐसे करामात/मोज़िजे (Supernatural powers, miracles) दिखाती है कि हमें ख़ुद के इंसान होने पर भी शक होने लगता है, शायद! ऐसे मेहसूस होता है कि जैसे किसी को बरसों बाद किसी दर्द से रिहाई मिली हो।
लेकिन जैसे ही मोहब्बत का ज़वाल आता है, हम नफ़रत सीखे हुए लोग ने तो मोहब्बत कर पाते और ना ही नफ़रत।
हमारा वजूद रोज ने जाने कितनी ही कशमकश/उलझनों(Complication) में से गुजरता है, खुदकुशी के हज़ारों ख्यालात हमारे ज़हन में घूमने के बावजूद हम ख़ुद की जात के बरअक्स(Opposite) मुस्कुरा रहे होते हैं।
मोहब्बत के ज़वाल का सबसे बड़ा मसला यही है कि हम ना तो किसी के रहते हैं ना ही अपनी ज़ात के।
मोहब्बत को लेकर हम आज तक कंफ्यूज रहे हैं, मोहब्बत भी शायद उन्ही के क़दम चूमती है, जो सबसे पहले अपनी ज़ात के साथ मुखलिश (Sincere) होते हैं।
हम शायद! सबसे पहले यहीं ग़लती करते हैं कि, ख़ुद की ज़ात को लेकर अपने ख्यालात को इंकार (Disapproval) करने लग जाते हैं। मसला हमारा भी नहीं है शायद!
नफ़रत करने वाले सख्स को मोहब्बत पर अगर कभी यकीन आए तो, इल्हामी (revelatory वो बात जो बतौर अल्हाम मालूम हो, आसमानी)यकीन आता है, उसे मोहब्बत हमेशा ख़ुदा की इनायत (Gift) लगती है....!
~वाहियात फिलोसॉफर
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