मंगलवार, 13 सितंबर 2022

फीलोसोफी आर्टिकल

में देखता हूं 
कभी अपने वक्त पर 
या कभी बगैर दस्तक दिए
आफ़त की तरह छा जाने वाली सोचें
कभी कोई छोटा-बड़ा हादसा
किसी को बोलता देखकर
किसी को किसी का साथ छोड़ता देखकर
या अपनी ख़ामोशी और अल्फ़ाज़ के बांझपन से

कभी तखील से टूटने में
अल्हाम और अब्हाम के मुबहम (आसमां से दिल में किसी बात का या ख्यालों के आने पर ना समझ आने पर उनका अक्स) मिटते हुए
ख़ुद से बिछड़ते हुए, अपने लिए किल्लत का सामान बनते रहना।

आशनाई (#connection) से कट कर बेगानगी (#estrangement) अपनाने में 
अपने मे'यार (#Standard) और पैमाने की पैमाईश में
ज़र्फ़ (#Ability) को ख़ुद से जुदा कर देने में 
खुशहाली और शोभा/दिखावे के लालच में
सूरतें और सीरतें खत्म हुई जाती हैं।

झुंझलाहट और एक बेरहम सी थकन है
जिसमे सारी हिम्मत/जोश (#Energy, strength, power, ability, the power and ability by which a person can do something) बे मौत मारी का चुकी हैं।

किसी आस की तदफीन करते हुए, बाकी होंसले भी बास मार देते हैं।

जमाईयां लेते, खांसते और छींकते हुए 
किसी अधेड़ उम्र बीमार से
जो मौत की राह हमवार/समतल (#Equable) करना जानता हो
ज़िन्दगी कभी सर्गोशियां नहीं करती।

एक-आध् कोई दोस्त कुछ-कुछ जानने लगता है
आंख में मोहब्बत के ख़्वाब मगर दिखला नहीं पाता, 
या शायद बात ही सारी तवज्जो की है
कोई भी तो नहीं है, जिस तरह में सोचूं या वो भी मेरी तरह, मन वे तन अपने दिल की चलाते हैं।

भागदौड़ में उकताहट कंधों पर उठाए
सारे दिन दूसरे किरदार अदा करते हुए
शाम को चारपाई पे गिरने में 
एक अजीब सी पहेली के हाथ हैं

में बस देखता रह जाता हूं....!🥀🖤

~वाहियात फिलोसॉफर

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