बल्कि इक्कीसवीं सदी के आख़िर में तुम्हें अपने कांपते हाथों से ख़त लिखूंगा।
तब जाने दुनिया कैसी होगी!
मेरे उस वक्त के लिखे हुए पुराने ख़त तब तक शायद अपनी अलग पहचान रखते हुए, किसी म्यूज़ियम में पड़े होंगे...
में बस तुम्हें इस लिए कॉल नहीं करूंगा, क्योंकि में जानता हूं तब भी तुम्हारी आवाज़ मुझे तुम्हारी तरफ खींचेगी!
और में कभी नहीं चाहूंगा, कि
में तेरे घर की दहलीज़ पर आकर अपनी आख़री सांस लूं....!
लेकिन हां शायद!
वो आख़री ख़त तेरी दहलीज पर कोई बरसों से फ्री की सैलरी लेने वाला डाकिया पकड़ा जाए!
तुम उसे खोलकर पढ़ने की हिम्मत मत करना!
बस एक कप चाय पीते हुए उसे आग लगा देना!
क्योंकि उसमें बस.....
तुम्हारे और मेरे नाम के अलावा कुछ नहीं होगा....!📚💐
~वाहियात फिलोसॉफर
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