कि जो जिंदगी की रगों से, जवां खून की आख़री बूंद तक खींच ले, जिस्म का खेत बंजर कर कर दे....
इस लिए जब से तू उस सफ़र पर गई,
मेने आईना देखा नहीं,
सारी दुनिया से और आसमान तक से पर्दा किया,
मेंने सर्दी में धूप और गर्मी में साये की परवाह न की,
जिंदगी को ना समझा कभी, जिंदगी आदतन सांस ली....
भूख़ तो मर् गई थी, जुदाई की पहली ही सा'अत में लेकिन अभी प्यास बाकी है,
और ऐसी ज़ालिम कि मेरे बदन पर बबूल उग रहे हैं,
जुबां पर भी कांटे पड़े हैं....
मुझे ऐसी दूरी की आदत नहीं है....
कि को मौत और ज़िन्दगी में कोई फ़र्क ना रहने दे,
फ़िर भी यह जान ले कि....
गर् जो मुझे चश्मे आब-ऐ-हयात भी मिल जाए, एक बूंद भी,
तेरे बिना मुझ पर जायज़ नहीं....!😔🤕
~फिलॉस्फर 💐
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